सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप किसी नीति के समर्थन या विरोध का सीधा निर्णय नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक चेतावनी है कि समानता के नाम पर लागू किए गए नियम यदि अस्पष्ट हों, दुरुपयोग की संभावना रखते हों और सामाजिक सौहार्द को बाधित करते हों, तो वे न्यायिक समीक्षा से परे नहीं रह सकते। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के माध्यम से उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के नाम पर लागू किए गए नए नियमों ने देश के शैक्षिक और सामाजिक परिदृश्य में एक बार फिर से गहरी हलचल पैदा कर दी है। जिस नीति को समता, समान अवसर और समावेशी शिक्षा की भावना से जोड़कर प्रस्तुत किया गया, वह व्यवहार में आते ही एक वर्ग विशेष के तीव्र विरोध, व्यापक असंतोष और सामाजिक तनाव का कारण बन गई। यह रोक न केवल सरकार के नीति-निर्माण की प्रक्रिया पर एक प्रश्नचिह्न है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अतिशयोक्तिपूर्ण और असंतुलित प्रयोग देश को किस दिशा में ले जा सकता है। समानता का अर्थ है सबके साथ एक जैसा व्यवहार, जबकि समता का अर्थ है परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संतुलित अवसर देना।





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